चिट्टा: नशे ने सिरसा की जवानियों को बना दिया जिंदा लाश
नशे में हमारा सिरसा | दम तोड़ रही जवानियाँ | नशे पर अंकुश लगाने में सरकार विफल |
चिट्टे के दंश से कांपती ये टांगे, सुनिए युवक की दर्दभरी कहानी
चिट्टे का ज़हरीला जंजाल: 18 की मस्ती में सूँघा पहला पाउडर, 30 की उम्र में 600 घावों वाली सड़ी लाश
बनकर पत्नी और बेटी पर बन गया बोझ
जिला सिरसा के एम शहर में रहने वाले 30 वर्षीय एक युवक की जिंदगी आज सिर्फ दर्द बनकर रह गई है। वह 18 साल का लड़का जो कभी हँसता-खेलता मजदूरी करता था, आज 30-32 का होकर भी जिंदा लाश बन चुका है।
उसका शरीर 600 से ज्यादा घावों से भरा है। पांव सूजे हुए हैं, इंजेक्शन के निशान फफोलों में के रूप में दिख रहे हैं। दोनों बाजुओं का मांस सड़ चुका है, कीड़े रेंग रहे हैं। मेहनत–मजदूरी,चलना-फिरना बंद हो चुका है। पांच साल पहले डॉक्टरों ने कह दिया था, “अब 2-4 दिन ही बचे हैं।” लेकिन रिंकू आज भी जिंदा है, हर सांस तड़प के साथ। यह कोई हॉरर फिल्म का सीन नहीं, यह “चिट्टा” का असली चेहरा है। युवक के सात दोस्तों में से पांच मर चुके। बाकी दो में एक रिंकू है, जो हर सांस को दर्द की कीमत पर ले रहा है। सबसे भयावह बात यह है कि यह कहानी अकेली नहीं है। सिरसा जिला के रानियां, डबवाली, कालांवाली, रोड़ी, सिरसा के हर कस्बे में दर्जनों युवक ज़िंदा लाश बनकर घूम रहे हैं। कोई 25 साल में बिस्तर पकड़ चुका, कोई 28 में दोनों हाथ खो चुका, कोई 30 में ओवरडोज लेकर तो कोई 19 में हार्ट फेल होकर मर चुका।
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युवक ने अपनी दर्दनाक कहानी सुनाते हुए बताया, 18 साल की उम्र में सीखा नशा
“करीब 10–12 साल पहले की बात है। तब मैं 18 साल का था। हम 5–7 साथी साथ मजदूरी करते थे। एक दिन एक साथी मस्ती में ‘चिट्टा’ ले आया। सबने पन्नी में लगाकर सूंघा, थकान गायब, शरीर हल्का लगने लगा। तब यह नहीं पता था कि यही मज़ा एक दिन मौत का जंजाल बन जाएगा। धीरे-धीरे यह रोज़ का सिलसिला बन गया। बिना चिट्टे के काम न होता था। नशा न मिले तो शरीर अकड़ जाता, चक्कर आते, नींद गायब हो जाती। पहले मालिक से दिहाड़ी के पैसे पहले मांग लेते थे, नशा करते, फिर काम पर लगते। दो साल तक ऐसा ही चला। फिर असर कम पड़ने लगा तो हमने ’चिट्टे के टीके’ लगाने शुरू कर दिए। अब हाल यह है कि हम सात में से पांच साथी मर चुके हैं।” कहानी सुनाते-सुनाते उसकी आंखें भर आईं। “मुझे भी कुछ साल पहले अग्रोहा मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया था। डॉक्टरों ने कहा — ‘अब इसके शरीर में कोई नस नहीं बची।’ उन्होंने मेरे परिजनों को कहा कि ‘यह बस 2–4 दिन का मेहमान है, इसे घर ले जाइए।’ घर आने के बाद मैंने टीके लगाना छोड़ दिया, पर नशे की गोली और कैप्सूल अब भी लेता हूं। मोहल्ले के डॉक्टर से इलाज चल रहा है। शायद परमात्मा की कृपा है कि अभी तक सांसें चल रही हैं।” इतना कहकर युवक ने अपना पायजामा उठाया — पैरों और जांघों पर बने करीब 400 जख्म देखकर रोंगटे खड़े हो गए। पैर सूजे हुए थे, जख्मों से मवाद टपक रहा था। उसने अपनी अकड़ी हुई दाईं बाजू उठाई तो सड़े हुए मांस और कीड़ों से भरा घाव दिखाई दिया, जिससे तीखी सड़ांध आ रही थी। दोनों बाजुओं पर करीब 200 टीकों के निशान बने हुए थे।
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मां बाप नाता तोड़ चुके, 7 साल की बेटी है, पत्नी दिनरात मजदूरी करके घर चला रही
युवक ने आंखें पोंछते हुए बताया —
“मैं शादीशुदा हूं। सात साल की एक बेटी है जो दूसरी कक्षा में पढ़ती है। माता-पिता और भाई-बहनों ने मुझसे नाता तोड़ लिया है। घर का सारा खर्च मेरी पत्नी मजदूरी करके उठाती है। मैं पिछले सात वर्षों से किसी काम लायक नहीं हूं। दर्द इतना बढ़ जाता है कि रातभर सो नहीं पाता। जब सहा नहीं जाता तो नशे की गोली या कैप्सूल ले लेता हूं। अब जीने का कोई उद्देश्य नहीं रहा। मैं अपनी पत्नी और बेटी पर बोझ बन गया हूं। अगर मैंने नशा न किया होता तो वे सुखी होते। मेरी गलती की सज़ा अब मेरी पत्नी और बेटी भुगत रहे हैं।” डॉक्टरों ने बाजू का ऑपरेशन कराने की सलाह दी है, पर घाव भरने का नाम ही ही ले रहा। दाईं बाजू बुरी तरह से अकड़ चुकी है तथा पांच साल से घाव बढ़ता जा रहा है। डॉक्टर कहते हैं कि नशे ने शरीर को इस कदर खोखला कर दिया है कि अब कोई दवा काम नहीं करती। अब समझ नहीं आता कि नशा छोड़ूं या मर जाऊं… नशा लूं तो भी मौत, छोड़ूं तो भी मौत।
मेरा जैसा कोई और ना बने—
“किसी भी व्यक्ति को नशा नहीं करना चाहिए। नशा चार दिन की मस्ती और पूरी जिंदगी की बर्बादी है। यह केवल एक व्यक्ति को नहीं, पूरे परिवार को तबाह कर देता है। मैंने अपनी आंखों से सबकुछ खोया है… अब बस यही चाहता हूं कि कोई और न बने।”
Author: Umesh Kumar
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