हिसारभेदभाव: अंतिम संस्कार में जातिगत भेदभाव पर NHRC संज्ञान

हिसार में जातिगत श्मशान घाट पर भेदभाव का मामला: NHRC ने रिपोर्ट मांगी

हरियाणा के हिसार जिले के खासा महाजनान गांव में एक ऐसे जातिगत भेदभाव (caste discrimination) का मामला सामने आया है, जिसने सामाजिक समता और मानवाधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने स्व-प्रेरणा से संज्ञान लिया है और जिला प्रशासन से दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी है।

हिसारभेदभाव का मामला तब सार्वजनिक हुआ जब गांव के श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार करते समय जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतें मिलीं। आरोप है कि कुछ समुदायों के मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए अलग-अलग श्मशान घाट का उपयोग किया जा रहा था, जिससे अनुसूचित जाति (SC) समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव की स्थिति बन गई। इस तरह का व्यवहार संविधान और नियमों के खिलाफ माना जाता है, क्योंकि भारत में किसी भी नागरिक को जाति के आधार पर किसी सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता।

NHRC ने बताया है कि उसने यह मामला स्वत: संज्ञान में लिया है, यानी बिना कोई शिकायतकर्ता कॉम्प्लेंट दर्ज कराए ही आयोग ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जांच शुरू कर दी। आयोग ने हिसार के उपायुक्त (DC) और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे दो सप्ताह के अंदर इस मामले में विस्तृत जवाब रिपोर्ट में प्रस्तुत करें। इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि घटनास्थल पर क्या परिस्थिति थी, किन कारणों से अलग-थलग श्मशान घाट का उपयोग हो रहा था, और प्रशासन ने भेदभाव को रोकने के लिए क्या कदम उठाए।

गौरतलब है कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर देता है। संविधान की धारा 15 यह सुनिश्चित करती है कि “राज्य किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान, आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।” इसी प्रकार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) उन मामलों पर ध्यान देता है जहाँ मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन होने की संभावना हो।

हिसारभेदभाव जैसे घटनाओं का सामाजिक प्रभाव व्यापक हो सकता है। श्मशान घाट जैसे स्थल, जहाँ अंतिम सम्मान और श्रद्धा के साथ विदाई दी जाती है, वहाँ पर किसी भी तरह का भेदभाव दुख और शर्म दोनों का कारण बनता है। दलित और अन्य पिछड़े समुदाय विवाह, शिक्षा, रोजगार जैसी सामाजिक सेवाओं में पहले ही कई चुनौतियों का सामना करते आए हैं, और ऐसे हालात से उनकी रक्षा को लेकर संवैधानिक संस्थाएँ सतर्क रहती हैं।

नीचे ऐसे ही भेदभाव-सम्बंधित मामलों में सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों ने कहा है कि समग्र श्मशान/कब्रिस्तान भूमि का उपयोग सभी समुदाय के लोगों को बिना किसी भेदभाव के मिलना चाहिए, और किसी भी सार्वजनिक स्थल पर जाति-आधारित अलग-अलग व्यवस्था संविधान के खिलाफ है।

एनएचआरसी की इस कार्रवाई से यह संदेश जाता है कि मानवाधिकारों का उल्लंघन किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होगा और यदि कहीं भी समाज में भेदभाव देखा जाता है तो प्रशासन और आयोग दोनों की निगाहें उस पर होंगी। अब देखना है कि हिसार प्रशासन किस तरह से जवाब रिपोर्ट तैयार करता है और क्या उसे सुधारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता महसूस होती है। इससे पहले भी आयोग ने कई मामलों में जातिगत स्तर पर अधिकारों की रक्षा के लिए सरकारी विभागों से जवाब मांगा था, जिनमें अंतिम संस्कार/श्मशान से जुड़े भेदभाव भी शामिल थे।

Umesh Kumar
Author: Umesh Kumar

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