झांकी में दिखी राजस्थान की पहचान, उस्ता कला की छाप

कर्तव्य पथ पर राजस्थान की झांकी, बीकानेर की उस्ता कला बनी आकर्षण

नई दिल्ली: गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली के कर्तव्य पथ पर निकली राज्यों की झांकी में इस बार राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत ने खास पहचान बनाई। राजस्थान की झांकी में बीकानेर की प्रसिद्ध उस्ता कला को प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया, जिसने देश-विदेश से आए दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। परेड के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी राजस्थान की झांकी को सराहा, जिससे राज्य के कलाकारों और प्रशासन में उत्साह देखा गया।

इसी बीच राजस्थान की झांकी में मरुस्थलीय संस्कृति, पारंपरिक रंगों और बारीक शिल्पकला का अनूठा संगम नजर आया। झांकी के अग्र भाग में उस्ता कला से सजी भित्ति और पारंपरिक शिल्प को दर्शाया गया, जो बीकानेर की पहचान मानी जाती है। इस कला की विशेषता सोने की पन्नी और महीन चित्रांकन है, जिसे राष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित कर राजस्थान ने अपनी समृद्ध विरासत को देश के सामने रखा।

बीकानेर की उस्ता कला बनी केंद्र

उस्ता कला राजस्थान की प्राचीन शिल्प परंपरा का अहम हिस्सा है। इसलिए झांकी में इसे केंद्र में रखकर यह संदेश दिया गया कि आधुनिकता के दौर में भी पारंपरिक कलाओं का संरक्षण जरूरी है। झांकी में कलाकारों द्वारा तैयार किए गए डिज़ाइन, रंग संयोजन और प्रतीकात्मक आकृतियां दर्शकों को राजस्थान के इतिहास और संस्कृति से जोड़ती नजर आईं।

प्रधानमंत्री की सराहना से बढ़ा उत्साह

परेड के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब राजस्थान की झांकी की ओर अभिवादन किया, तो इसे राज्य के लिए गौरवपूर्ण क्षण माना गया। इसके अलावा रक्षा मंत्री, अन्य गणमान्य अतिथियों और विदेशी मेहमानों ने भी झांकी की प्रस्तुति को ध्यान से देखा। इसलिए यह झांकी केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि राजस्थान की कला परंपरा का राष्ट्रीय सम्मान भी बन गई।

कर्तव्य पथ पर दिखी सांस्कृतिक विविधता

वहीं दूसरी ओर, कर्तव्य पथ पर निकली विभिन्न राज्यों की झांकियों के बीच राजस्थान की झांकी अपनी कलात्मक बारीकी और रंगों के कारण अलग पहचान बनाती दिखी। परेड देखने पहुंचे दर्शकों ने भी उस्ता कला पर आधारित झांकी की जमकर तस्वीरें लीं और तालियों से स्वागत किया।

कला संरक्षण का संदेश

राजस्थान की झांकी के माध्यम से यह संदेश भी दिया गया कि पारंपरिक कलाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। राज्य के सांस्कृतिक विभाग से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि इस तरह के मंच कलाकारों को प्रोत्साहन देते हैं और लोक कलाओं को वैश्विक पहचान दिलाने में मदद करते हैं।

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Author: Umesh Kumar

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