सोमनाथ इतिहास: गजनवी का हमला और नेहरू की आपत्ति

सोमनाथ विवाद: गजनवी, लूट और नेहरू पर उठते सवाल

सोमनाथ मंदिर का इतिहास एक बार फिर चर्चा में है। महमूद गजनवी, मंदिर विध्वंस, कथित लूट और आज़ादी के बाद पुनर्निर्माण को लेकर पंडित जवाहरलाल नेहरू की भूमिका पर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। इतिहासकारों और प्रमाणिक दस्तावेज़ों के आधार पर इन दावों को समझना ज़रूरी है।

गुजरात राज्य के गिर-सोमनाथ जिले में स्थित सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी ने 1025–26 ईस्वी के बीच हमला किया था। यह घटना प्रभास पाटन क्षेत्र में हुई, जो उस समय एक समृद्ध धार्मिक और व्यापारिक केंद्र था। फारसी इतिहासकार अल-उत्बी और बाद के स्रोतों में मंदिर पर हमले और संपत्ति लूट का उल्लेख मिलता है। हालांकि, किसी भी समकालीन ऐतिहासिक दस्तावेज़ में यह प्रमाण नहीं मिलता कि सोमनाथ के शिवलिंग के टुकड़े किसी मस्जिद में लगवाए गए हों।

इसी बीच, सोशल मीडिया और कुछ पुस्तकों में यह दावा किया जाता है कि गजनवी ने मंदिर से “6 टन सोना” लूटा। इतिहासकारों के अनुसार, यह आंकड़ा अतिशयोक्तिपूर्ण है। स्रोतों में केवल “अत्यधिक धन” या “बहुमूल्य संपत्ति” का ज़िक्र है। सटीक मात्रा को लेकर कोई आधिकारिक या प्रमाणिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इसलिए 6 टन सोने की बात को तथ्य के बजाय अनुमान माना जाता है।

सोमनाथ पर हमला क्यों हुआ

इतिहासकार मानते हैं कि गजनवी का आक्रमण मुख्य रूप से राजनीतिक और आर्थिक कारणों से प्रेरित था। उस दौर में समृद्ध मंदिर सत्ता और संपत्ति के केंद्र होते थे। वहीं, धार्मिक प्रतीक तोड़ना राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने का एक तरीका भी माना जाता था। दूसरी ओर, इसे केवल धार्मिक संघर्ष के रूप में देखना इतिहास को एकांगी बना देता है।

इसके अलावा, आज़ादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर भी विवाद सामने आया। 1947 के बाद इस कार्य की पहल तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने की। मंदिर का निर्माण सार्वजनिक सहयोग से हुआ और इसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक माना गया।

नेहरू की भूमिका को लेकर क्या सच है

पंडित जवाहरलाल नेहरू मंदिर निर्माण के विरोधी नहीं थे। उनकी आपत्ति सरकार की औपचारिक भागीदारी को लेकर थी। नेहरू चाहते थे कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित हो, जहां राज्य किसी एक धर्म के प्रतीक से सीधे न जुड़े। इसलिए राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा उद्घाटन को लेकर उन्होंने असहमति जताई थी।

वहीं, इतिहासकारों का कहना है कि नेहरू का दृष्टिकोण प्रशासनिक और संवैधानिक था, न कि धार्मिक विरोध का। इसलिए उन्हें “मंदिर विरोधी” बताना तथ्यों का सरलीकरण माना जाता है।

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Author: Umesh Kumar

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