प्रयागराज माघ मेला विवाद: अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस, 24 घंटे में साबित करें ‘शंकराचार्य’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश: प्रयागराज माघ मेले (Magh Mela) के आयोजन स्थल संगम चौराहा, इलाहाबाद/प्रयागराज में धार्मिक और प्रशासनिक विवाद तूल पकड़ चुका है। माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पिछले तीन दिनों से धरने पर बैठे हैं। इसी बीच प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने उन्हें एक औपचारिक **नोटिस जारी किया है और 24 घंटे के भीतर यह साबित करने को कहा है कि वे वास्तव में ‘शंकराचार्य’ हैं।
इसी बीच अधिकारियों ने नोटिस में कहा है कि वर्तमान में न्यायालय में एक लंबित मामला है जिसमें यह तय होना है कि ज्योतिषपीठ का वैध शंकराचार्य कौन है। 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि तब तक किसी को भी शंकराचार्य नहीं घोषित किया जा सकता जब तक अंतिम फैसला नहीं आ जाता। नोटिस में यह भी स्पष्ट किया गया कि इस आदेश को ध्यान में रखते हुए वह ‘शंकराचार्य’ के पद का उपयोग क्यों कर रहे हैं, इसका जवाब 24 घंटे में देना आवश्यक है।
धरने के बीच अविमुक्तेश्वरानंद और उनके समर्थक प्रशासन के इस कदम का विरोध कर रहे हैं। आधे से ज़्यादा समय से धरने पर बैठे अविमुक्तेश्वरानंद ने अन्न और जल का त्याग किया हुआ है और पानी तक नहीं ग्रहण किया है। उन्होंने प्रशासन और पुलिस से आदर के साथ संगम स्नान करने की अनुमति देने व क्षमा मांगने की मांग की है।
वहीं नोटिस पर प्रतिक्रिया देते हुए अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से कहा गया कि वे पहले से ही शंकराचार्य के रूप में पट्टाभिषेकित हैं और यही पद उन्हें वैध रूप से प्राप्त है। उनके मीडिया प्रतिनिधि शैलेन्द्र योगीराज ने बताया कि नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देना गलत है और इसके खिलाफ वे कानूनी कदम उठाएंगे।
प्रशासनिक पक्ष और कारण
प्रशासन ने नोटिस में यह तर्क रखा है कि ज्योतिषपीठ शंकराचार्य के पद को लेकर विवाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और इस कारण से किसी भी व्यक्ति के ‘शंकराचार्य’ पद का प्रयोग करना न्यायालय के आदेश का उल्लंघन माना जा सकता है। इसलिए उन्होंने 24 घंटे का समयसीमा निर्धारित किया है, जिसमें वे यह साबित करें कि उनका शंकराचार्य होने का दावा वैध है।
इस विवाद की शुरुआत तब हुई थी जब मौनी अमावस्या के अवसर पर अविमुक्तेश्वरानंद की प़ालकी संगम पर स्नान के दौरान रोक दी गई और पुलिस तथा प्रशासन के बीच विवाद खड़ा हो गया। समर्थकों ने पुलिस द्वारा उनके साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं।
प्रभाव और पृष्ठभूमि
इस विवाद ने धार्मिक और प्रशासनिक स्तर पर बहस को जन्म दिया है। धार्मिक समुदाय के कुछ हिस्सों ने प्रशासन के रुख की आलोचना की है और दावा किया है कि किसी संत को इस प्रकार नोटिस जारी करना धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध है। वहीं कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का सम्मान करना आवश्यक है और वर्तमान में कोई भी शंकराचार्य का पद पाने का दावा न्यायालय के आदेश के बिना मान्य नहीं है।
इस विवाद से माघ मेले के आयोजन और व्यवस्था पर भी प्रश्न उठ रहे हैं, क्योंकि यह मेले में लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति और सामाजिक-धार्मिक गतिविधियों के बीच प्रशासन की भूमिका को चुनौती देता है।
Author: Umesh Kumar
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