‘हमें बचा लो, बांग्लादेश में मर जाएंगे’: 14 भारतीयों का बांग्लादेश डिपोर्टेशन विवाद में
ओडिशा और पश्चिम बंगाल बॉर्डर के पास रहने वाले 14 लोगों को डिपोर्ट कर देने का मामला अब सामाजिक और राजनीतिक विवाद में बदल गया है। इन 14 लोगों को भारत से बांग्लादेश भेजे जाने के बाद उनके परिजन और स्थानीय समुदाय ने सवाल उठाए हैं कि उनके पास कई दशक पुराने दस्तावेज हैं, फिर भी उन्हें क्यों बाहर किया गया।
ये घटना 8 दिसंबर 2025 को शुरू हुई जब ओडिशा पुलिस ने शेख जब्बार और उनके परिवार के सदस्यों समेत कुल 14 लोगों को हिरासत में लिया। बाद में करीब 26 दिसंबर 2025 को उन्हें पश्चिम बंगाल के नदिया जिले से बांग्लादेश भेज दिया गया, जहाँ वे अब कठिन हालात का सामना कर रहे हैं।
इसी बीच, परिवार की बहन रहिमा का कहना है कि शेख जब्बार का परिवार ओडिशा में कई दशक से रह रहा है। उनके पास केवल वोटर कार्ड नहीं, बल्कि आधार कार्ड, राशन कार्ड और 60 साल पुराने जमीन के कागजात भी हैं। इसके बावजूद उन्हें ‘घुसपैठिया’ करार देकर भेज दिया गया है।
परिवार का कहना है कि उन्हें जबरदस्ती हिरासत में लिया गया और बाद में बीएसएफ ने उन्हें सीमा पार कर दिया। बांग्लादेश में दस्तावेजों की माँग के दौरान वे सही कागजात दिखा नहीं पाए, जिस वजह से बांग्लादेशी सुरक्षा बलों ने उन्हें वापस भारत वापस भेज दिया। लेकिन बीएसएफ ने उन्हें फिर से बांग्लादेश ले जाकर पुशबैक कर दिया।
रहिमा ने बताया कि परिवार में 90 साल की बुजुर्ग महिला और पांच बच्चे भी शामिल हैं, जो ठंड और भूख के साथ संघर्ष कर रहे हैं। वे भारत लौटने की गुहार लगा रहे हैं, क्योंकि उनके पास बांग्लादेश में खाने-पीने और रहने की कोई व्यवस्था नहीं है।
परिवार के अनुसार वे ओडिशा के जगतसिंहपुर और पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में लंबे समय से रहते थे और स्थानीय मतदाता सूची में उनके नाम दर्ज हैं। फिर भी उन्हें अवैध प्रवासी मानकर बाहर किया गया है।
इस मामले पर पुलिस ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। परिजन इसे व्यापक स्तर पर हो रहे अवैध डिपोर्टेशन प्रयासों का हिस्सा मान रहे हैं। 2025 में देश भर में कई ऐसे मामलों की रिपोर्टें आई हैं जहाँ संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर लोगों को पकड़कर डिटेंशन या डिपोर्ट करने की कार्रवाई हुई है।
विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में चल रही SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची की जांच ने कई ऐसे मामलों को सामने लाया है जहाँ लोगों के पास भारतीय पहचान दस्तावेज होने के बावजूद उनके पास बांग्लादेशी पासपोर्ट भी मिला है। इससे कई विवाद पैदा हुए हैं और चुनाव आयोग तक नाम हटाने की सिफारिशें भेजी जा रही हैं।
मानवाधिकार समूहों ने चेतावनी दी है कि बिना due process या प्रमाणिकता की जाँच के ऐसे डिपोर्टेशन से नागरिकों के अधिकारों को खतरा हो सकता है। भारत-बांग्लादेश की सीमा-सुरक्षा प्रक्रियाएँ जटिल हैं, और यदि कोई व्यक्ति वैध नागरिकता साबित नहीं कर पाता तो उसे पुशबैक या डिपोर्ट किया जा सकता है।
हालाँकि अधिकारी कहते हैं कि अवैध प्रवास और फर्जी दस्तावेजों का उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है, ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रियाएँ और अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक बताया जाता है।
Author: Umesh Kumar
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