168 साल बाद भी इंसाफ़ नहीं, शहीदों की हड्डियाँ कुएं में
भारत की आज़ादी की कहानी में कई ऐसे शहीद हैं, जिनका बलिदान आज भी इतिहास के अंधेरे में दबा हुआ है।
पंजाब के अमृतसर जिले में स्थित अजनाला कस्बे का एक कुआं 1857 की क्रांति के सबसे निर्मम अध्याय का गवाह है, जहां अंग्रेजों ने 282 भारतीय शहीदों को जिंदा दफना दिया था। यह घटना आज से करीब 168 साल पहले घटी थी।
इतिहासकारों के मुताबिक, 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजी सेना से बगावत करने वाले भारतीय सिपाहियों को पकड़ा गया।
इन शहीदों को तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी फ्रेडरिक कूपर के आदेश पर अमृतसर के अजनाला में एक कुएं में धकेल दिया गया।
घटना के बाद कुएं को बंद कर दिया गया और वर्षों तक यह शहीदों की अस्थियों का कब्रिस्तान बना रहा।
कुएं से मिले कंकाल, सच हुआ उजागर
साल 2014 में जब प्रशासन और इतिहासकारों की मौजूदगी में कुएं की खुदाई कराई गई, तो वहां से 282 कंकाल बरामद हुए।
डीएनए और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अध्ययन से पुष्टि हुई कि ये सभी 1857 के वही शहीद थे, जिन्हें अंग्रेजों ने अमानवीय तरीके से मारा था।
वहीं, यह खुलासा भी हुआ कि कुएं में फेंके जाने से पहले कई शहीदों को गोली मारी गई, जबकि कुछ को जिंदा ही अंदर डाल दिया गया था।
इसके बावजूद आज तक इन शहीदों को राष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार हैं।
हत्यारे अफसर के नाम पर आज भी सड़क
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन शहीदों को अंग्रेजों ने मारा, उसी हत्या का जिम्मेदार अधिकारी फ्रेडरिक कूपर आज भी विवाद का केंद्र है।
अमृतसर शहर में अब भी एक सड़क कूपर रोड के नाम से जानी जाती है, जिसे लेकर लगातार विरोध होता रहा है।
इतिहासकारों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि एक तरफ शहीदों के कंकाल आज भी न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं, दूसरी ओर हत्यारे अधिकारी के नाम पर सड़क होना राष्ट्रीय चेतना पर सवाल खड़े करता है।
दूसरी ओर, स्थानीय प्रशासन का तर्क है कि नाम बदलने का प्रस्ताव सरकार के स्तर पर लंबित है।
सम्मान और स्मारक की मांग
शहीदों के वंशजों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि अजनाला के उस कुएं को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाए।
इसके अलावा, शहीदों के अस्थि-अवशेषों का पूरे सम्मान के साथ पुनः अंतिम संस्कार और स्मृति स्थल का निर्माण किया जाए।
इसी बीच, कई संगठनों ने केंद्र और राज्य सरकार से यह भी मांग की है कि कूपर रोड का नाम बदलकर शहीदों के नाम पर रखा जाए।
उनका कहना है कि जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक 1857 के ये शहीद सच्चे अर्थों में आज़ाद नहीं माने जा सकते।
इतिहास का अधूरा न्याय
यह मामला सिर्फ अतीत की त्रासदी नहीं, बल्कि यह सवाल भी है कि भारत अपने शहीदों को कैसे याद करता है।
168 साल बाद भी कुएं में पड़े कंकाल यह याद दिलाते हैं कि आज़ादी की कीमत कितनी भयावह थी।
इसलिए, अजनाला के ये शहीद सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि आज की नैतिक जिम्मेदारी भी हैं।
Author: Umesh Kumar
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