परेड का इतिहास: शक्ति प्रदर्शन से लोकतांत्रिक उत्सव तक

खूनी जुलूस से गणतंत्र परेड तक, सैन्य शक्ति का बदलता संदेश

नई दिल्ली: हर 26 जनवरी की सुबह, जब धुंध को चीरती सूरज की किरणें दिल्ली के कर्तव्य पथ पर पड़ती हैं, तब परेड केवल सैन्य रेजिमेंटों और रंगीन झांकियों का दृश्य नहीं रहती। वह हजारों साल पुराने इतिहास, सत्ता के प्रतीकों और राष्ट्र की प्राथमिकताओं को भी सामने लाती है। समय के साथ परेड का स्वरूप बदला है, लेकिन उसका संदेश आज भी उतना ही प्रभावशाली बना हुआ है।

इतिहास में परेड की जड़ें प्राचीन साम्राज्यों के “विजय जुलूसों” में मिलती हैं। रोमन साम्राज्य में युद्ध जीतने के बाद सेनाएं हथियारों और बंदियों के साथ शहरों में प्रवेश करती थीं। मध्यकालीन यूरोप और एशिया में भी शासक अपनी ताकत दिखाने के लिए ऐसे जुलूस निकालते थे। कई बार ये जुलूस हिंसक होते थे, जिनका मकसद जनता में भय पैदा करना होता था। इसलिए इन्हें खूनी जुलूस कहा गया।

इसी बीच आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के उदय के साथ परेड का अर्थ बदला। अब इसका उद्देश्य केवल डर दिखाना नहीं, बल्कि अनुशासन, संगठन और सैन्य तैयारी का सार्वजनिक प्रदर्शन बन गया। भारत की गणतंत्र दिवस परेड इसी बदलाव का उदाहरण है। यहां सेना के साथ-साथ संविधान, सांस्कृतिक विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी मंच मिलता है। झांकियों के जरिए राज्यों की पहचान दिखाई जाती है, जिससे परेड एक राष्ट्रीय उत्सव का रूप ले लेती है।

क्यों होती है फौज और हथियारों की नुमाइश

विशेषज्ञों के अनुसार, परेड में हथियारों की नुमाइश दो उद्देश्य पूरे करती है। पहला, संभावित बाहरी खतरों को यह संदेश देना कि देश अपनी सुरक्षा के लिए तैयार है। दूसरा, नागरिकों में भरोसा पैदा करना कि उनकी सेना सक्षम और संगठित है। इसलिए परेड केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक संदेश भी देती है।

यूरोप-अमेरिका क्यों कतराने लगे

वहीं दूसरी ओर, यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में भव्य सैन्य परेड अब कम देखने को मिलती हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवों के बाद जर्मनी जैसे देशों में हथियारों की सार्वजनिक नुमाइश को आक्रामक अतीत से जोड़ा जाता है। अमेरिका में भी सेना के सम्मान के लिए स्मृति दिवस और विशेष समारोह होते हैं, लेकिन नियमित सैन्य परेड पर जोर नहीं है। वहां लोकतांत्रिक समाज हथियारों से ज्यादा कूटनीति और तकनीक को प्राथमिकता देता है।

आज की परेड का संदेश

आज की परेड केवल परंपरा नहीं, बल्कि नीति और भविष्य का संकेत भी है। कौन-सी तकनीक प्रदर्शित हो रही है, किस क्षेत्र पर जोर दिया जा रहा है और कौन-सा सांस्कृतिक संदेश दिया जा रहा है—ये सभी बातें राष्ट्र की दिशा को दर्शाती हैं। इसलिए गणतंत्र दिवस की परेड इतिहास और वर्तमान के बीच सेतु बनकर सामने आती है।

Umesh Kumar
Author: Umesh Kumar

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